
पूरी दुनिया की नजरें आज अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर टिकी है। यूएस प्रेसिडेंट चुनाव की एक अनूठी प्रणाली है, जिसकी वजह से नतीजे सीधे पॉपुलर वोट से तय नहीं होते हैं। पॉपुलर वोट देश भर के नागरिकों की ओर से डाले गए व्यक्तिगत वोटों की कुल संख्या को कहते हैं। यह लोगों की प्रत्यक्ष पसंद को दर्शाता है, जहां हर वोट को समान रूप से गिना जाता है।
क्या है अमेरिका में होने वाले चुनाव की प्रणाली ?
दरअसल अमेरिका में होने वाले चुनाव भारत की चुनावी प्रणाली से बिल्कुल अलग हैं। यहां इलेक्टोरल कॉलेज की प्रणाली के माध्यम से चुनाव होते हैं। 5 नवंबर को अमेरिकी वोटर्स डेमोक्रेट उम्मीदवार कमला हैरिस या रिपब्लिकन प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप के लिए वोट करेंगे, लेकिन वे वोट सीधे तौर पर यह निर्धारित नहीं करेंगे की कौन जीतेगा। अमेरिकी जब वोट देते हैं तो वे वास्तव में उन इलेक्टर के ग्रुप के लिए वोट कर रहे होते हैं, जो उनकी पसंद का प्रतिनिधित्व करेंगे। ये इलेक्टर फिर अपने राज्य के भीतर लोकप्रिय वोट के आधार पर राष्ट्रपति के लिए वोट करते हैं।
जीतने के लिए होगी 270 वोट की जरूरत:
यूएस प्रेसिडेंशियल चुनाव राष्ट्रीय मुकाबले की जगह पर राज्य-दर-राज्य मुकाबला है। 50 राज्यों में से किसी एक में जीत का मतलब है कि उम्मीदवार को सभी तथाकथित इलेक्टोरल कॉलेज वोट मिल गए। कुल 538 इलेक्टोरल कॉलेज वोट हैं। राष्ट्रपति पद जीतने के लिए उम्मीदवार को बहुमत – 270 या उससे ज्यादा हासिल करने की जरूरत होती है। उनका साथी उप-राष्ट्रपति बनता है। यही वजह है कि किसी उम्मीदवार के लिए पूरे देश में कम वोट हासिल होने पर भी राष्ट्रपति बनना संभव है अगर वह इलेक्टोरल कॉलेज बहुमत हासिल कर ले। प्रत्येक राज्य को एक निश्चित संख्या में इलेक्टर मिलते हैं। इलेक्टर यानी वो लोग जो इलेक्टोरल कॉलेज में वोट करते हैं। प्रत्येक राज्य में इलेक्टर संख्या मोटे तौर पर उसकी जनसंख्या के आधार के अनुरूप होती है।
Author: AK
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