
जिले में नमामि गंगे अंतर्गत “गंगा उत्सव” का आयोजन, स्वछता शपथ कार्यक्रम से हुई इसकी शुरुआत; संगम घाट पर दीपोत्सव कार्यक्रम का भी आयोजन, मृत शैया पर पड़ी है जहानाबाद की दरधा-जमुनी नदी
जल संसाधन मंत्रालय ,भारत सरकार तथा नगर विकास एवं आवास विभाग और जिला प्रशासन के द्वारा जहानाबाद में 4 नवंबर 2024 को ‘गंगा उत्सव ‘ के रूप में मनाने की घोषणा की है। जिले में नमामि गंगे अंतर्गत “गंगा उत्सव” का आयोजन किया जा रहा है। जिसकी शुरुआत प्रातः 8:00 बजे, हॉस्पिटल मोड़ स्थित दरधा नदी के तट पर स्वच्छता शपथ कार्यक्रम से हुई।


इसके बाद आज 11:00 बजे उच्च विद्यालय, अमैन में बालको एवं बालिकाओं के रग्बी प्रतियोगिता का भी आयोजन होगा वहीं गांधी स्मारक इंटर विद्यालय ,जहानाबाद में छात्र-छात्राओं के बीच चित्रकला ,वाद विवाद एवं संगीत प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाएगा और अंततः संध्या में संगम घाट में दीपोत्सव के साथ इसकी समाप्ति होगी। जिला प्रशासन ने नगरवासियों से “गंगा उत्सव ” में सम्मलित होने तथा गंगा एवं अन्य जल स्रोतों को स्वच्छ, सुंदर रखने के दृढ़ संकल्प को दोहराने एवं उसे पूरा करने में प्रशासन के सहयोगी बनने की अपील की है।
जहानाबाद शहर दरधा-जमुनी नदियों के संगम पर बसा है और हमें यह कहने में गर्व महसूस होता है लेकिन अगर इन नदियों को देख कर कोई भी इसे स्वर्णिम इतिहास के अलावा कुछ और नही कह सकता। दोनो नदियां पूर्ण रूप से नाले में तब्दील हो चुकी है और इसकी दो वजहें है। पहली वजह नदियों में बढ़ रहा अतिक्रमण और दूसरी है शहर से निकल रहे तमाम नाली और नालों का सीधे नदी में गिरना। जिससे नदियों में गाद जमती जा रही है और नदियों की गहराई भी कम होते जा रही है। भला हो कुदरत का की बरसात के दिनों में तीव्र गति से पानी आने से स्वतः ही नदियों की सफाई हो जाती है और खुद को अगले एक वर्ष के कूड़े-कचड़े को समाहित करने के लिए तैयार हो जाता है।
दो दशकों में कोई ठोस कदम नहीं:
जिलेवासियों और जिला प्रशाशन का रवैया भी कुछ खास रहा है नहीं है इन नदियों को लेकर। नगर के लोग डोर टू डोर कूड़ा उठाने की सुविधा के बाद भी अपनी पूजा के बाद कि सामग्री सीधे नदियों में डाल देते है। जिला प्रशासन की बात करें तो अब तक इन नदियों के पुनर उद्धार के लिए कोई ठोस कदम बीते 2 दशकों में दिखाई नहीं पड़ा है। कोई भी मास्टर प्लान या रोड मैप प्रशासन धरातल पर उतार नहीं पाई है।
जागरूकता और चेतना की कमी:
समय समय पर अतिक्रमण मुक्ति के लिए जिला प्रशासन कदम उठाता रहता है लेकिन इसके वावजूद नदियों में अतिक्रमण और अवैध निर्माण रुकने का नाम नहीं ले रहा जिसके फलस्वरूप नदियां संकरी होते जा रही है। वहीं प्रशासन समय समय पर जागरूकता अभियान भी चलाती है ताकि लोग नदियों की महत्ता को समझे और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी निभाएं।
छठ पर्व के दौरान जिला प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ता दिखतें है तत्पर:
हर वर्ष संगम घाट पर लाखों श्रद्धालु छठ पर्व मनाने पहुंचते है। छठ पर्व अपनी शुद्धता के लिए मशहूर है। संगम घाट सहित तमाम घाटों और तलाबों की जिला प्रशासन के द्वारा साफ सफाई और रंगों रोजन का कार्य कर चकाचक कर दिया जाता है। पेंटिंग और सफाई देख कर संगम घाट की भव्यता देखते बनती है। दीवालों पर कलाकारों द्वारा उकेरी गई मिथिला पेंटिंग इसकी सुन्दता में चार चांद लगाते है। प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ता छठ पर्व को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते और उनके प्रयासों की सराहना अगर नहीं कि जाए तो यह उनके नियत और मेहनत दोनों के साथ बईमानी होगी।
कहीं श्रद्धा से खिलवाड़ तो नहीं?
लेकिन बात घूमकर वहीं आती है कि संगम घाट में आ रहा पानी तो गंदा ही है, जिसे छठ व्रती तथा श्रद्धालुओं के भावनाओं के साथ जाने अनजाने में खिलवाड़ तो हो हीं रहा है। सवाल यही है कि क्या छठ के समय सिर्फ संगम घाट को चमका कर पूरे नदी को जीवित रख पाएंगे????
नगरवासियों को भी समझनी होगी अपनी जिम्मेदारी:
नगरवासियों की उदासीन रवैया भी इन नदियों की मृत अवस्था के लिए उतनी हीं जिम्मेदार है। आधी आबादी को ये सभी मुद्दों से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें बस मतलब है अपने दिनचर्या और अपने क्रिया कलापों की, अगर उसमे कोई वाधा आती है तभी आंदोलन करेंगे। सारी साफ सफाई की जिम्मेदारी जिला प्रशासन के कंधों पर डाल खुद की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों से किनारा कर लेने की आदत भी इसकी बड़ी वजह है।
महज तमाम संस्थाएं कितनी भी कोशिश कर लें जब तक सोया हुआ समाज, सोया शहर और सोई हुई जनता नहीं जागेगी तब तक नदियों का यही हाल रहेगा। अगर शहर की दोनों नदियों को बचाना है तो सरकारी, गैर सरकारी तथा आम नागरिकों को साथ मिलकर कार्य करना होगा।
: अभिषेक कुमार
Author: AK
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