वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर संसद में विशेष चर्चा आयोजित की जा रही है। पीएम मोदी बहस की शुरुआत करेंगे, जिसमें इसके इतिहास और महत्व पर फोकस होगा।
150 Years of Vande Mataram: Historic Debate in Parliament
वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ: संसद में ऐतिहासिक चर्चा का महत्व
भारत की संसद में 8 दिसंबर को एक विशेष अवसर के लिए अनोखी बहस का आयोजन किया जा रहा है। यह अवसर है वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ का, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव का प्रतिनिधित्व करता है। संसद का शीतकालीन सत्र वैसे भी कई महत्वपूर्ण विधायी मुद्दों और नीतिगत चर्चाओं के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार एक राष्ट्रीय भावना से जुड़े विषय पर संपूर्ण सदन में चर्चा होने जा रही है। यह बहस इसलिए भी अहम है क्योंकि वंदे मातरम न केवल एक गीत है, बल्कि भारतीय पहचान की आधारशिला है।
वंदे मातरम पर संसद में विशेष बहस क्यों महत्वपूर्ण है
लोकसभा में इस बहस की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की जाएगी। यह अपेक्षा जताई जा रही है कि वे गीत के इतिहास, इसके सामाजिक प्रभाव और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इसके साथ ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बहस का समापन संबोधन देंगे। राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह इस चर्चा का नेतृत्व कर सकते हैं, जिससे यह साफ है कि सरकार इस राष्ट्रीय प्रसंग को अत्यंत गंभीरता से ले रही है।
कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के नेता भी बहस में भाग लेंगे। कांग्रेस के आठ नेताओं को बोलने का अवसर दिया गया है, जिनमें गोरव गोगोई, प्रियंका वाड्रा, दीपेंद्र हुड्डा और अन्य सांसद शामिल हैं। यह बहस बहुदलीय सहभागिता का उदाहरण होगी, जिसमें सभी दल एक साझा ऐतिहासिक धरोहर का सम्मान करने के लिए एक मंच पर नजर आएंगे।
वंदे मातरम: इतिहास, संदर्भ और महत्व
बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचना
वंदे मातरम को बंगाल के महान लेखक और चिंतक बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को पहली बार साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित किया था। उस समय भारत अंग्रेजों के शासन में संघर्ष कर रहा था और यह गीत भारतीय समाज के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार करता था।
बाद में, वर्ष 1882 में इसे बंकिम चंद्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। ‘आनंदमठ’ एक ऐसा साहित्यिक ग्रंथ है जिसने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में वैचारिक प्रेरणा का काम किया। वंदे मातरम उसी उपन्यास में मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रभक्ति का गीत बनकर उभरा।
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा संगीत रूप
गीत को आवाज और संगीत की पहचान नवंबर 1896 में मिली, जब रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कांग्रेस के अधिवेशन में स्वरबद्ध करके प्रस्तुत किया। इसके बाद वंदे मातरम पूरे देश में लोक-गीत की तरह फैल गया और स्वतंत्रता सेनानियों का नारा बन गया।
उन दौरों में जब अंग्रेजी शासन जनता पर कठोर प्रतिबंध लगाता था, वंदे मातरम गाते हुए आंदोलनों, जुलूसों और सभाओं में लोगों को एकजुट किया जाता था। यह गीत भय के माहौल में साहस का प्रतीक बन चुका था।
राष्ट्रीय गीत का दर्जा
भारत सरकार ने 24 जनवरी 1950 को वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। संविधान सभा में भी इस गीत के प्रति व्यापक सम्मान देखने को मिला। भले ही जन गण मन को राष्ट्रगान का दर्जा मिला, लेकिन वंदे मातरम आज भी भारत की राष्ट्रीय भावना, सांस्कृतिक पहचान और स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास का केंद्रीय स्तंभ है।
150वीं वर्षगांठ: भारतीय इतिहास का निर्णायक क्षण
150वीं वर्षगांठ महज एक तिथि नहीं है। यह उन 150 वर्षों की यात्रा का प्रतीक है जिसमें वंदे मातरम ने क्रांति की आवाज, साहित्य का सौंदर्य, आध्यात्मिक आस्था और राष्ट्रीय एकता को एकसाथ जोड़ा। संसद में इस पर बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नई पीढ़ी को उस ऐतिहासिक विरासत से जोड़ने का अवसर है जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने जीवित रखा था।
बहस में सामने आ सकते हैं ये मुद्दे
संसद में होने वाली बहस में कई महत्वपूर्ण विषयों को उठाया जा सकता है—
- वंदे मातरम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका
- गीत पर साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण
- आधुनिक भारत में वंदे मातरम का स्थान
- युवा पीढ़ी के बीच राष्ट्रगीत के प्रति जागरूकता
यह बहस देशभर में वंदे मातरम की पुनर्स्मृति अभियान की तरह भी काम कर सकती है।
सांसदों की भूमिका और बहुदलीय सहभागिता
संसद में इस बहस में केवल सरकार ही नहीं, बल्कि विपक्ष के भी कई सांसद सक्रिय रूप से भाग लेंगे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और युवा सांसदों को भी बोलने का अवसर दिया गया है। यह दर्शाता है कि वंदे मातरम कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ा विषय है।
यह पहली बार नहीं है जब संसद ने ऐतिहासिक या सांस्कृतिक विरासत पर विशेष बहस आयोजित की हो, लेकिन वंदे मातरम के संदर्भ में यह बहस इसलिए अलग है क्योंकि यह राष्ट्रीय गीत की 150 साल की यात्रा का औपचारिक सम्मान है।
नई पीढ़ी और राष्ट्रीय गीत का महत्व
आज के समय में जब तकनीक, सोशल मीडिया और तेज जीवनशैली ने कई ऐतिहासिक तथ्यों को पीछे धकेल दिया है, ऐसी चर्चाएँ युवाओं में रुचि और जागरूकता बढ़ाती हैं।
वंदे मातरम का महत्व केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है। यह गीत मातृभूमि से जुड़ी भावनाओं को जीवित रखता है, और संसद में होने वाली बहस युवाओं को उसके मूल अर्थ और प्रयोजन से जोड़ने का एक अवसर प्रदान करेगी।
सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय पहचान
वंदे मातरम की सबसे बड़ी ताकत इसकी भाषा और भावनाओं में है। यह गीत राष्ट्र को माता का रूप देता है और जन-जन को उसकी सेवा में एकजुट होने की प्रेरणा देता है। यह केवल बंगाल या किसी विशेष क्षेत्र की कृति नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक सांस्कृतिक धरोहर है।
संसद में होने वाली यह चर्चा संदेश देती है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखकर सम्मान दिया जाना चाहिए।
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Author: AK
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